ना सडे ना जन्ग लगे
ना सडे ना जन्ग लगे घिसे ना कबहू जोन बाटे तो बढत रहत कहो वो आयुध कोन
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ना सडे ना जन्ग लगे घिसे ना कबहू जोन बाटे तो बढत रहत कहो वो आयुध कोन
ना सडे ना जन्ग लगे घिसे ना कबहू जोन बाटे तो बढत रहत कहो वो आयुध कोन
पाव चार पर चल न पाऊ अपने आप घिसट न पाऊ पर ना समझो हू बेकाम मुझसे मिले इज्जत आराम
ढाई अक्षर नाम मे एक शहर कहलाए जग प्रसिध हर काल मे शासक बेठा पाए
एक आहार घर घर मै डटा बदन है पूरा उसका फटा धरती जन्मे काफी ज्यादा रुप-रन्ग है बिल्कुल सादा
ना व्रक्ष पर ना खेत मै ना अनाज ना हू फल खाने मै हू डाला जाता यह बात मानो तुम अटल
रोन्दे जिसको उसको काटे कभी बनता हत्थयारा इसे जेल फासी न होती रखे बिना नही चारा
काली हे पर काग नही लम्बी हे पर नाग नही बलखाती पर डोर नही बन्धती हे पर ढोर नही
ज्यो ज्यो बढत हे त्यो त्यो ही घटत हे जगत भर का नियम ये कहू मिटा नही पाहि
राम जी का लम्बा सीता जी का ग़ोल शन्कर जी का आडा उत्तर जल्दी बोल
मुर्गी एक निराली चलत-चलत थक जाये लाऑ चाकू काटो गर्दन फिर वो चलन पाये
आदि कटे कीमत बने मध्य कटे तो बाम छिलका वाको काठ सम मेवा वाको नाम
अन्गुल भर की कोठरी सेकडो गाय समाय घर की माटी मोम बने छुए कठिन हो जाये
अपनी देह पर सूत लपटे, उस बंदे को नाचत देखा | पाँव अजबूा है लोहे का , बदन पर रहती पाँच - छः रेखा |
वह पाले ना भैस या गाय, फिर भी दुध मलाई खाए | घर बैठे ही करे शिकार , गया शेर भी उससे हार |
एक नार का सस्ता रेट लम्बी गर्दन मोटा पेट पहले अपना पेट भरे फिर सबको शीतल करे
एक टान्ग पर खडी रहू मे एक जगह पर अडी रहू मे अन्धियारे को दूर भगाऊ धीरे धीरे गलती जाऊ
एक नगरी मे चोसठ घर दो पास बेठे भर चाव उस नगरी का यही स्वभाव कटे-मरे, लगे न घाव
काले कपडे, क्डवी बोली स्वय चतुर कहलाता हे पाल पराए बच्चो को वह मुर्ख भी बना जाता हे
अगल बगल घास फूस बीच मे तबेला दिन भर तो भीड भाड रात मे अकेला