सारे जगत की करूँ मैं सैर धरती पे रखता नहीं पै...
सारे जगत की करूँ मैं सैर धरती पे रखता नहीं पैर रात अँधेरी मेरे बगैर बताओ क्या है मेरा नाम ?
200 पहेलियां मिलीं
बच्चों के लिए आसान और मजेदार पहेलियां
सारे जगत की करूँ मैं सैर धरती पे रखता नहीं पैर रात अँधेरी मेरे बगैर बताओ क्या है मेरा नाम ?
घुसा आँख में मेरे धागा दर्जी के घर से मैं भागा
तीन पैरों वाली तितली नहा धो के कढ़ाई से निकली
पीली पोखर पीले अंडे जल्द बता नहीं मारूँ डंडे
सुबह सुबह ही आता हूँ दुनिया की ख़बरें लाता हूँ सबको रहता मेरा इंतजार हर कोई करता मुझसे प्यार
पैर नहीं फिर भी चलती है बताओ क्या ?
ना कभी किसी से किया झगड़ा ना कभी करी लड़ाई फिर भी होती रोज पिटाई
दिन में सोये रात में रोये जितना रोये उतना खोये
कद के छोटे कर्म के हीन बीन बजाने के शोकीन बताओ कौन?
एक पक्षी ऐसा देखा , ताल किनारे रहता था . मुंह से आग उगलता था , दुम से द्रव को पिता था
एक टांग से खड़ा हुआ हूं , एक जगह पर अड़ा हुआ हूं . भरी छाता है मैंने ताना , सब जीवों को देता हूं खाना
गोल-गोल चीजें बहुतेरी , सर्वश्रेष्ट हूं , मानो मेरी . इसको तुम समझो न गप , मैं रुठुं तो दुनिया ठप
एक टांग पर खाड़ी रहूँ मैं , एक जगह पर अड़ी रहूँ मैं . अंधियारे को दूर भगाऊं , धीरे-धीरे , गलती जाऊं
एक तरुवर का फल है तर , पहले नारी , बाद में नर . वा फल की यह देखो चाल , बाहर खाल और भीतर बाल
एक नगरी में चौबीस घर , दो पास बैठें भर चाव . उस नगरी का यही स्वभाव , कटें-मरें , लगे न घाव .
काले कपड़े , कड़वी बोली , स्वयं चतुर कहलाता है . पाल पराए बच्चों को वह , मुर्ख भी बन जाता है .
अगल बगल घास फूस , बीच में तबेला . दिन भर तो भीड़ भाड़ , रात में अकेला .
देखी ऐसी नार चतुरंगी , घर के बाहर निकले नंगी . जा कोई वाके धार को चाखे , वो जीवन की आस ना राखे .
लंबा-चौड़ा रूप निराला , उजली देह किनारा काला . जो धोबिन करती है काम , उसका भी वही है नाम .
उसको सूरज कभी न भाय , अंधियारे में निकसत प्राय . ज्यों-ज्यों सौंप ताल को खाय , सूखे ताल सौंप मर जाय ...