एक ऐसा वृक्ष होता जिस पर फल लगे सकल वर्ष।।
एक ऐसा वृक्ष होता जिस पर फल लगे सकल वर्ष।। सब्जी, पानी, सलाद, किसी में भी डालो रस।।
141 पहेलियां मिलीं
चालाकी से सोचने वाली ट्रिकी पहेलियां
एक ऐसा वृक्ष होता जिस पर फल लगे सकल वर्ष।। सब्जी, पानी, सलाद, किसी में भी डालो रस।।
फटेहाल रहता है हरदम ,द्वार -द्वार तक जाए | चाहे कितना जतन करे, यह मनचाहा न पाए ||
एक नारी के बारह बेटे , पोते है कुल साठ | हर पोते के साठ है बेटे ,नारी बिलकुल काठ ||
जब ये जलते है, तो रोते है | सब इन्हें जलाकर खुश होते है ||
लम्बी लकड़ी पर चढ़ा मसाला, देवता खुश उसे जलाये | सुगन्धित करे घर मंदिर को ,जो जाने वह कोई हमें बताये...
धीरे से चलकर यह है आती खिल-खिलाकर हंसी बनाती न है नाक पर और न कान होंठो पर है उसकी पहचान
सीटी इसकी घर-घर बाजे खाना पके पल भर लागे मिलता सबको चावल-दाल बूझो गोपू का यह सवाल
चौंसठ खानों का एक मैदान, बच्चे-बूढ़े सबका रुझान विश्व को भारत का यह दान, कहे गोपू भी सीना तान
खेल यह भैया बड़ा अनोखा, दूजे की हद में दो उसे धोखा ताल ठोंका, सांस रोका, छू वापस दौड़ा, छोड़ा न मौका
हरि का द्वार खुले यहाँ, मिले गंगा की निर्मल धारा मनसा पूरी करती देवी, दिखे साधू-संतों का नज़ारा
वह वृक्ष होता फलदार भी। इसक फल दानेदार भी। इस नाम में तीन अक्षर बताए। इसका शरबत भी बनाया जाए।
हिमालय में मेरा निवास। फलदार हूं मैं एकदम खास। मेरे नाम में दो अक्षर। पहेली बतावें साक्षर।।
सूखे क्षेत्र का फल सेब कहलाता। हर कोई है फल को चाय से खाता।। अजा ही पत्ते भूख मिटाते। लागे टेडे नुक...
सारे तन में छेद कई हैं इन छेदों का भेद यही है ये ना हों तो मैं बेकार इनसे ही है मेरा संसार तब ही...
नरम कुरकुरा नाजुक काया बिखर जाऊं गर जोर से दबाया पर जब खाने की हो तैयारी मुझ बिन अधूरी रोटी तरकार...
एक पड़ी रेखा ,उसके ऊपर एक खड़ी रेखा | एक दोनों के ऊपर नीचे मिली रेखा | बताओ इसके क्या बने ,बनाने वा...
अन्धकार को दूर भगाया ,जगमग किया सागर | बल्ब ढूंढ़ किसने किया ,अदभुत यह चमत्कार ||
बिन लकड़ी का पेड़ हूँ मैं , फल मुझ पर भी लगते | बड़े - बड़े पत्ते है मेरे , पर गिनती के हाथ ||
पत्तो के सम उसका रंग ,कुतर - कुतर खाने का ढंग | पिंजरे में भी पाला जाता ,नाम बताओ अब तो ज्ञाता ||
दो अक्षर का मेरा नाम ,आता हू खाने के काम | सबके मन में भाव जगाऊ , उल्टा करो तो नाच दीखाऊ ||